Loading...

  • 【अध्याय 1 अर्जुनविषादयोग 42】

    Ratnesh Kumar Sahu

    Download Image

    __________________________________________

    🐁🐁🐁🕯ॐ श्रीगणेशाय नम:🕯🐁🐁🐁

    __________________________________________

    श्लोक -

    सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।

    पतन्ति पितरो ह्येसां लुप्तपिण्डोदकक्रिया:॥ 42।।

    __________________________________________

    श्लोकार्थ -

    वर्णसंकर कुलघातियों को और  कुल को नरक में ले जाने वाला ही (होता है)। श्राद्ध और तर्पण न मिलने से इन (कुलघातियों)-के पितर भी (अपने स्थान से) गिर जाते हैं।

     __________________________________________

    शब्दार्थ -

    सङ्कर:=वर्णसंकर

    कुलघ्नानाम्=कुलघातियों को

    च=और 

    कुलस्य=कुल को

    नरकाय=नरक में ले जाने वाला

    एव=ही (होता है)।

    लुप्तपिण्डोदकक्रिया:= श्राद्ध और तर्पण न मिलने से

    एषाम्=इन (कुलघातियों)-के

    पितर:=पितर

    हि=भी (अपने स्थान से)

    पतन्ति=गिर जाते हैं।

    __________________________________________

    भावार्थ -

    सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च’—वर्ण-मिश्रण से पैदा हुए वर्णसंकर-(सन्तान-) में धार्मिक बुद्धि नहीं होती। वह मर्यादाओं का पालन नहीं करता; क्योंकि वह खुद बिना मर्यादा से पैदा हुआ है। इसलिये उसके खुद के कुलधर्म न होने से वह उनका पालन नहीं करता, प्रत्युत कुलधर्म अर्थात् कुलमर्यादा से विरुद्ध आचरण करता है।

     जिन्होंने युद्ध में अपने कुल का संहार कर दिया है, उनको 'कुलघाती’ कहते हैं। वर्णसंकर ऐसे कुलघातियों को नरकों में ले जाता है। केवल कुलघातियों को ही नहीं, प्रत्युत कुल-परम्परा नष्ट होने से सम्पूर्ण कुल को भी वह नरकों में ले जाता है।

     'पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया’: —जिन्होंने अपने कुल का नाश कर दिया है, ऐसे इन कुलघातियों के पितरों को वर्णसंकर के द्वारा पिण्ड और पानी (श्राद्ध और तर्पण) न मिलने से उन पितरों का पतन हो जाता है। कारण कि जब पितरों को पिण्ड-पानी मिलता रहता है, तब वे उस पुण्य के प्रभाव से ऊँचे लोकों में रहते हैं। परन्तु जब उनको पिण्ड-पानी मिलना बन्द हो जाता है, तब उनका वहाँ से पतन हो जाता है अर्थात् उनकी स्थिति उन लोकों में नहीं रहती।

     पितरों को पिण्ड-पानी न मिलने में कारण यह है कि वर्णसंकर की पूर्वजों के प्रति आदर-बुद्धि नहीं होती। इस कारण उनमें पितरों के लिये श्राद्ध-तर्पण करने की भावना ही नहीं होती। अगर लोक-लिहाज में आकर वे श्राद्ध-तर्पण करते भी हैं, तो भी शास्त्रविधि के अनुसार उनका श्राद्ध- तर्पण में अधिकार न होने से वह पिण्ड-पानी पितरों को मिलता ही नहीं। इस तरह जब पितरों को आदरबुद्धि से और शास्त्रविधि के अनुसार पिण्ड-जल नहीं मिलता, तब उनका अपने स्थान से पतन हो जाता है।

     परिशिष्ट भाव—पितरों में एक 'आजान’ पितर होते हैं और एक 'मत्र्य’ पितर। पितरलोक में रहने वाले पितर 'आजान’ हैं और मनुष्यलोक से मरकर गये पितर 'मत्र्य’ हैं। श्राद्ध और तर्पण न मिलने से मत्र्य पितरों का पतन होता है। पतन उन्हीं मत्र्य पितरों का होता है, जो कुटुम्ब(परिवार) से, सन्तान से सम्बन्ध रखते हैं और उनसे श्राद्ध-तर्पण की आशा रखते हैं।

    _________________🔮🔮🔮________________

    ⭐ गीता श्लोक सहित अध्ययन कीजिये क्योंकि -

    अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो:।

    ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति:॥ 18/70॥

    जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा — ऐसा मेरा मत है।

    ⭐ गीता को शेयर कीजिये क्योंकि -

    य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।

    भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:॥ 18/68॥

    मुझमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद गीता को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा- इसमें कोई सन्देह नहीं है।

    _________________🙏🙏🙏_________________

    स्मरणीय तथ्य -

    1⃣ यह लेख स्वामी रामसुखदास जी द्वारा रचित साधक संजीवनी से लिया गया है।

    __________________________________________

    __________________________________________

    इसे पढ़िए व शेयर कीजिये कृष्ण प्रसन्न होंगे।

    __________________________________________

    __________________________________________

    |0|0